गिला – Gila Poetry

ज़िन्दगी सर्द एक ख़ला है मुझे;
टूटे ख़्वाबों का क़ाफिला है मुझे.
तेरे होने से मुझे सुकूं कब था;
तेरे जाने का पर गिला है मुझे.

करूं भी तो करूं शिक़ायत क्या;
राहतों का भी तू सिलसिला है मुझे.

पहन रक्खा है जिस्मानी हमनें पैराहन;
वस्ल के रोज़, ये भी तो फ़ासला है मुझे.

कभी नफ़रत में भी लज़्ज़त तलाश लेता था;
अब तो उल्फ़त भी जाने क्यों कर्बला है मुझे.

दिल-ओ-जज़्बात को बहुत दूर दूर रखता है;
शायरी का ये कैसा हुनर मिला है मुझे.

Originally published as one of my Facebook Notes on my personal profile on Facebook on November 1, 2012.


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