मक़ाम – Maqaam Poetry

जाने क्यूँ हर मुक़ाम पर बस तू ही मिल गया;
ये ज़िन्दगी तुझसे कभी आगे नहीं गयी.

वो जानता था बात बिगड़ जायेगी लेकिन;
उससे जुबां अपनी संभाली नहीं गयी.

सीने पे मेरे ज़ख्मों के दाग़ हैं बहुत;
नज़र मगर उससे झुकाई नहीं गयी.

दामन में मेरे कांटे हैं बस, और कुछ नहीं;
मुख़्तसर सी बात ये समझाई नहीं गयी.

बारहा किया था मैंने ज़िक्र-ए-ज़ख्म-ए-दिल;
गहरायी फिर भी दर्द की दिखाई नहीं गयी.

जाना हो जब तुम्हें, न थामूं तुम्हारा हाथ;
मुझसे मगर ये शर्त निभाई नहीं गयी.

Originally published as one of my Facebook Notes on my personal profile on Facebook on May 13, 2012.


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